संतोष
संतोष (दोहे) जिनके मन संतोष है, मनुज वही खुशहाल। लालच है सबसे बुरा, रूप बड़ा विकराल।। माया के जंजाल से, रहें सदा ही दूर। संतोषी रहकर सदा, पाएं सुख भरपूर।। नाशवान है ये जगत, करो न मन आसक्त। रहें सदा संतोष से, शांत रहें हर वक्त।। लालच दुख का मूल है, कर दें इसका त्याग। संतोषी रहता सुखी, बुझे लोभ की आग।। भौतिक सुख की लालसा,मन को करेअशुद्ध। रखता जो संतोष धन, होता वही प्रबुद्ध।। © डॉ एन के सेठी