योग
विषय-योग
विधा-कलाधर छन्द
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योग को बनाय अंग होय रोग शोक दूर
जिंदगी बने सुखी शरीर भी सुडौल हो।
शक्ति जीवआत्म को मिले बढ़े सुभक्तिभाव
चित्त शांत आत्म औऱ ईश का सुमेल हो।।
ब्रह्म और जीव का समस्त द्वैध दूर होय
सिर्फ एक भाव चित्त वृत्ति का निरोध हो।
स्वस्थ होय सर्व गात जीव हो तनाव मुक्त
योग से बढ़े उमंग दुःख भी निरुद्ध हो।।
कर्म और ज्ञान योग मेल दोउ होय एक
साथ आय सृष्टि पूर्ण जीव जीव एक हो।
धर्म जाति पंथ भाष देश को मिलाय योग
विश्व है कुटुम्ब एक चित्त भाव नेक हो।।
क्रोध मोह राग द्वेष रोग शोक दूर होय
प्रीति रीति योग है बढ़ाय आत्म शक्ति को।
मुक्त हो तनाव से न आय पास में निराश
कामना रहे न पाय कर्म से विरक्ति को।।
योग से रहे निरोग ये रखे सुयोग्य योग
ज्ञान गंग भी बहे विनाश अंधकार हो।
दीप ज्ञान का जलाय शक्ति अंग अंग आय
योग ईश ध्यान जीव जीव में प्रसार हो।।
स्फूर्ति धार अंग अंग में बढ़ाय प्रेम भाव
साँस साँस योग ईश साधना सभी करें।
कालिमा मिटे सभी हमार चित्त शुद्ध होय
भावना विशुद्ध होय योग नित्य ही करें।।
जिंदगीअमोल जान योग ध्यान नित्य मान
ओम जाप ध्यान पूर्ण चित्त से सदा करे।
भक्तिभाव पुष्ट होयआधिव्याधि खत्म होय
ब्रह्मकाल जाग जाय योग नित्य ही करें।।
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©डॉ एन के सेठी
बाँदीकुई(दौसा)राज.
सार्थक सटीक रचना
जवाब देंहटाएंSunder
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंVery nice
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